सोमवार, 25 दिसंबर 2017

फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है .....

मयस्सर डोर से
फिर एक मोती झड़ रहा है ,
तारीखों के जीने से
दिसम्बर उतर रहा है |

कुछ चेहरे घटे , चंद यादे जुड़ी
गए वक़्त में, 
उम्र का पंछी नित दूर और दूर
उड़ रहा है |...

गुनगुनी धूप और ठिठुरी राते
जाड़ो की,
गुजरे लम्हों पर झिना झिना
पर्दा गिर रहा है।
फिर एक दिसम्बर गुजर रहा है

मिट्टी का जिस्म
एक दिन मिट्टी में मिलेगा ,
मिट्टी का पुतला
किस बात पर अकड़ रहा है |

जायका लिया नही
और फिसल रही जिन्दगी ,
आसमां समेटता वक़्त
बादल बन उड़ रहा है |

...फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

कहाँ पर बोलना

कहाँ पर बोलना है
और कहाँ पर बोल जाते हैं।
जहाँ खामोश रहना है
वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।

कटा जब शीश सैनिक का
तो हम खामोश रहते हैं।
कटा एक सीन पिक्चर का
तो सारे बोल जाते हैं।।

नयी नस्लों के ये बच्चे
जमाने भर की सुनते हैं।
मगर माँ बाप कुछ बोले
तो बच्चे बोल जाते हैं।।

बहुत ऊँची दुकानों में
कटाते जेब सब अपनी।
मगर मज़दूर माँगेगा
तो सिक्के बोल जाते हैं।।

अगर मखमल करे गलती
तो कोई कुछ नहीँ कहता।
फटी चादर की गलती हो
तो सारे बोल जाते हैं।।

हवाओं की तबाही को
सभी चुपचाप सहते हैं।
च़रागों से हुई गलती
तो सारे बोल जाते हैं।।

बनाते फिरते हैं रिश्ते
जमाने भर से अक्सर।
मगर जब घर में हो जरूरत
तो रिश्ते भूल जाते हैं।।

कहाँ पर बोलना है
और कहाँ पर बोल जाते हैं।
जहाँ खामोश रहना है
वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।